गर्मियों का मौसम था बाड़मेर संभाग में रेत के टीले तेज धुप से गर्म होकर अंगारों की तरह दहक रहे थे। गर्म हवाएं ऐसे चल रही थी मानो हर जीवित प्राणी को जला कर भस्म कर दे। वही खेजड़ी के पेड़ की छाया में बैठा एक सोढा राजपूत नौजवान बाहरी गर्मी के साथ उसके भीतर उठ रहे विचारों में दहक रहा था।

वह विचारों में इस कदर डूबा था कि आज हर मौसम उसके लिए एक सामान था। न उन्हें गर्मी का अहसास हो रहा था और न ही उन्हें समय की सुध थी। आज उस नौजवान को ससुर का पत्र मिला था जिसमे साफ साफ लिखा था कि अगर मेरी बेटी से विवाह करना है तो जल्दी से दो हजार रुपये का प्रबंध करो और अगर प्रबंध नहीं कर पाये तो मैं अपनी बेटी का विवाह किसी ओर से कर दूंगा। पृथ्वीसिंह के माता पिता का निधन हो चूका था और विरासत में मिली जमीन सेठ के पास गिरवी रखी हुई थी

अतः उन्हें यह चिंता सता रही थी की इतने ज्यादा रूपये कहाँ से लाये। वे पैसों की चिंता के साथ सो गए लेकिन नींद उनकी आँखों में न थी। सुबह जल्दी उठे और उसी साहूकार के पास गए जहाँ उनके पिता ने जमीन गिरवी रखी थी। साहूकार से जब उन्होंने पैसों की मांग की तो साहूकार ने यह कहते हुए हामी भरी की अगर वह पैसों के बदले कुछ गिरवी रखे तो पैसे मिल सकते है। पृथ्वीसिंह ने सेठ से कहा कि जमीन तो पहले से ही तुम्हारे पास गिरवी है और दूसरी कोई चीज मेरे पास नही है लेकिन मेरे पास केवल यह तलवार है और तुम इसकी कीमत अच्छे से जानते हो। सेठ ने कुछ देर सोचा और कहा की में तो एक व्यापारी हूँ इसलिए तलवार का क्या करूँगा

लेकिन अगर मेरे लिखे कागज पर तुम दस्तखत कर दो तो तुम्हे दो हजार रूपये दे सकता हूँ पृथ्वीसिंह को अपनी मंगेतर से शादी करनी थी ओर बात अब इज्जत की थी इसलिए ऐसे में उन्हें हर शर्त मंजूर थी । उन्होंने उस कागज में लिखे शब्द पढ़े ओर बेबस होकर उसपे दस्तखत कर दिए। कागज में लिखा था कि ” मैं पृथ्वी सिंह सोढा जब तक सेठ माणिक राव सरावगी से उधार लिए पैसे ब्याज सहित नहीं लौटा देता तब तक अपनी पत्नी को बहन समझूंगा “
पृथ्वीसिंह ने पैसे ले जाकर अपने ससुर को दे दिए और विवाह कर अपने घर आ गये। बे अपनी पत्नी को बहुत अच्छे से रखते थे लेकिन रात को सोते समय दोनों के बिच में तलवार रख कर सो जाते थे। उस राजपूतानी ने कुछ दिन तो यह सोच कर निकाल दिए की शायद पैसो की मांग से वे अब भी नाराज है लेकिन उसके यह समझ नहीं आ रहा था की दिन में वे बहुत प्रसन्नता से बाते करते है बहुत खुश रखते है पर रात होते ही उनका स्वभाव बदल जाता है। राजपूतानी ने आखिरकार इसका कारण उनसे पूछ ही लिया और जब उनने सारी बात बतायी तो राजपूतानी को गर्व हुआ की उनके पति वचन का कितने पक्के है।

तब उन्होंने अपने पति से कहा की की आप मेरे यह गहने बेच के घोड़े ले आओ और हम दोनों कही नौकरी ढूंढ कर जल्द ही सेठ से लिया कर्ज़ ब्याज सहित चूका देंगे। राजपूतानी के कहे अनुसार पृथ्वीसिंह ने दो घोड़े खरीदे और चल पड़े नौकरी ढूंढ़ने। राजपूतानी भी पुरुष का वेश बना अपने पति के साथ निकल पड़ी दोनों नौजवान घोड़े पर बैठे ऐसे लग रहे थे मानों यह कोई परित्यक्त राजकुमार हो। कुछ दिनों के सफर के बाद दोनों चितौड़ के समीप पहुँच गये और संयोग से शिकार पर जाते महाराणा रतन सिंह की नजर उन बांके छबीले नौजवानो पर पड़ी। जब महाराणा ने उन्हें अपने पास बुलाकर उनका परिचय पूछा तो उन्होंने परिचय देते हुए नौकरी की तलाश के लिए चितौड़ आने बारे में महाराणा को अवगत कराया। महाराणा ने कहा की तुम दोनों मेरे साथ शिकार पर चलो और वापस आ कर मैं तुम्हे अपना फैसला बताऊंगा। दोनों महाराणा के साथ शिकार पर चल दिए। पुरुष बनी राजपूतानी ने अपनी धनुष कला का परिचय देते हुए जंगली सूअर पर तीर चलाया जो सूअर का शरीर बींधते हुए बाहर निकल गया जिसे देख महाराणा बहुत खुश हुए । उधर सोढा राजपूत ने भी सूअर की टोली पर भाला फेंका जिसने बह भाला 2 सूअरों को एक साथ बीधता हुआ बाहर निकल गया । महाराणा दोनों की युद्ध कला से बेहद प्रभावित हुये तब दोनों युवाओं को अपने महल में रात के समय शयन कक्ष की पहरेदारी का जिम्मा सौंप दिया।
महाराणा के कहे अनुसार दोनों रात में शयन कक्ष की पहरेदारी करने लगेे । कुछ दिन बीत जाने पर एक रात बहुत जोरों से बरसात हो रही थी। सावन का मौसम अपने चरम पर था काली अंधेरी रात में बिजलियाँ चमक रही थी, हवाये जोरों से चल रही थी जिसने पुरुष पहरेदार बनी राजपूतानी में विरह की भावना जगा दी बह पति के पास जाकर उसके कंधे पर हाथ रखती है हाथ रखते ही दोनों ऐसे कांप गए जैसे उन पर बिजली टूट पड़ी हो| पृथ्वीसिंह ने चेताते हुए कहा-“राजपूतानी संभल ! राजपूतानी पृथ्वीसिंह द्वारा चेताने पर अपने आपको एक गहरी निस्वाश: छोड़ते हुए सँभालते हुए बोली:-
देस बिया घर पारका , पिय बांधव रे भेस |
जिण जास्यां देस में , बांधव पीव करेस ||
अपना देश छुट गया और अब परदेश में है| पति पास है पर वह भाई रूप में है | जब कभी अपने वतन जायेंगे तो पति को पति बनायेंगे ।उधर शयन कक्ष में महाराणा गहरी नींद में थे लेकिन महारानी ने उन दोनों की बातें सुन ली और सुबह महारानी ने यह बात महाराणा को बता दी की इन दोनों युवाओं में से एक स्त्री है पर राणा जी को इस बात पर विश्वास नही हो रहा था अतः दोनों ने उनकी परीक्षा लेने की सोची। जब महाराणा एवं महारानी खाना खा रहे थे तो दोनों को बुलाया गया दोनों रसोईघर के बाहर खड़े इंतजार करने लगे की तभी रसोईघर ने दूध उफनने लगा जिसे देख राजपूतानी एकाएक बोल पड़ी की दूध उफन रहा है। यह सुनते महारानी समझ गई कि स्त्री कोन है, महारानी ने उनसे कहा की तुम दोनो ने इस प्रकार से झुठ का सहारा क्यों लिया। राजपूतानी ने जब आप बीती सुनाई तो महारानी ने उसे गले लगा लिया और कहा वचन के पक्के तुम दोनों ने समाज के लिए एक मिशाल कायम की है। महाराणा ने दोनों को अकूत सम्पति दी एवं पृथ्वीसिंह को अपनी सेना में उच्च पद दे कर उनको -उनके खुद केेे गांव की जागीर प्रदान की। अब दोनों खुशी-खुशी अपने गाँव लौट रहे थे सेठ का कर्ज़ चुकाने।अब हैरान होने की बारी सेठ की थी क्यूंकि दोनों अपनी ही जागीर के सेठ का कर्ज चुकाने चल पड़े थे। पृथ्वीसिंह आगे जाकर रतन सिंह को अलाउदीन खिलजी की कैद से छुड़वाने में अहम् भूमिका निभाते है

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