ठाकुर जी के महान भक्त, जिनकी भक्ति के कारण खुद ठाकुर जी दर्शन देने उपस्थित हुएआमेर के राजा
ठाकुर जी के महान भक्त, जिनकी भक्ति के कारण खुद ठाकुर जी दर्शन देने उपस्थित हुएआमेर के राजा


वाराणसी -यह वर्ष 1567 में सितम्बर का महीना था। उत्तर भारत की यात्रा कर वापस लौटे मुग़ल सम्राट अकबर के वफादार सेनापति और उनके नवरत्नों में से एक मानसिंह बादशाह के दरबार में हाजिर हुए और लगभग चीखते हुए कहा ” हुजुर, पूरा बनारस तबाह हो चुका है ,हजारो मंदिर उजाड़ दिए गए हैं ,शहर को आपके निगाहें इनायत की जरुरत है “।अकबर जो खुद भी नहीं जानता था वो बनारस से नाराज क्यूँ है,मानसिंह की आँखों में छायी उदासी को पढ़ सकता था। उसने बिना देर किये कहा “मानसिंह ,बनारस को आप देखें “।king man singhफिर क्या था,बार बार बनता और ध्वस्त होता बनारस एक बाद फिर चमक उठा ।मानसिंह ने बनारस में डेरा डाल लिया और राजस्थान के कारीगरों की पूरी फ़ौज काशी के नवनिर्माण में लगा दी ।इतिहासकार मानते हैं कि अकबर के इस सेनापति ने बनारस में एक हजार से ज्यादा मंदिर और घाट बनवाये ,मानसिंह के बनवाये घाटों में सबसे प्रसिद्द मानमंदिर घाट है इसे राजा मानसिंह ने बनवाया था बाद में जयसिंह ने इसमें वेधशाला बनवाई ।बनारस में अनुश्रुति है कि राजा मानसिंह ने एक दिन में 1 हजार मंदिर बनवाने का निश्चय किया ,फिर क्या था उनके सहयोगियों ने ढेर सारे पत्थर लाये और उन पर मंदिरों के नक़्शे खोद दिए इस तरह राजा मानसिंह का प्रण पूरा हुआ।
न होते मानसिंह तो कैसे बनता काशी विश्वनाथ
अम्बर के राजा मानसिंह और बनारस का नाता आज भी पूरे शहर में नजर आता है। मानसिंह के वक्त की सबसे प्रसिद्द घटना विश्वनाथ मंदिर की पुनः रचना की है,अकबर ने पुनर्निर्माण का काम मानसिंह को सौंपा था।लेकिन जब मानसिंह ने विश्वनाथ मंदिर का निर्माण करवाना शुरू किया त
करना शुरू कर दिया।गौरतलब है कि हुसैन शाह शर्की (1447-1458) और सिकंदर लोधी (1489-1517) के शासन काल के दौरान एक बार फिर इस मंदिर को नष्ट कर दिया गया था। लेकिन बाद में मानसिंह के साथी राजा टोडर मल ने अकबर द्वारा की गयी वित्त सहायता से एक बार फिर इस मंदिर का निर्माण करवाया।
वैधशाळा का भी कराया था निर्माण
मानसिंह ने मानमंदिर घाट का निर्माण यात्रियों के ठहरने के लिए कराया था,आज भी इसे लोग जयपुर राजा का मंदिर कहते हैं उन्ही के वंश के सवाई जयसिंह द्वितीय ने जो अपने समय के प्रसिद्द ज्योतिर्विद थे 1737 में एक वेधशाला स्थापित की ।बताया जाता है कि समरथ जगन्नाथ नाम के जयसिंह के एक प्रसिद्द ज्योतिष ने इस वेधशाला का नक्शा बनवाया था और जयपुर के ही सरदार महोन ने जो जयपुर के एक शिल्पी थी यह वेधशाला तैयार कराई। इसमें कई किस्म के यंत्र थे जिनसे लग्न इत्यादि साधने का काम किया जाता था ।
तुलसीदास के शिष्य थे मानसिंह
मानसिंह और बनारस का नाता यही ख़त्म नहीं हुआ।अकबर ने जब 1582 में फतेहपुर सिकरी में खुद के द्वारा स्थापित किये गए नए धर्म “दीन -ए- इलाही पर चर्चा करने विद्वानों को बुलाया तो उस वक्त उसका विरोध केवल राजा भगवंत दास ने किया था ,लेकिन बाद में मानसिंह ने भी इसका विरोध किया और अपने पुत्र के साथ बनारस में गोस्वामी तुलसीदास से शिक्षा लेने लगे ,गौरतलब है कि तुलसीदास ,अकबर के समकालीन थे। इतिहास बताता है कि जब मुग़ल सेना इंदु नदी को पार करके दुश्मनों पर आक्रमण करने से घबरा रही थी उस वक्त मानसिंह को तुलसीदास की चौपाई याद आई “सबै भूमि गोपाल की या में अटक कहाँ’, जाके मन में अटक है सोई अटक रहा।”इस चौपाई को कहने के बाद मानसिंह अपने नेतृत्व में सेना को लेकर नदी पार कर गए।

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