ठाकुर जी के महान भक्त, जिनकी भक्ति के कारण खुद ठाकुर जी दर्शन देने उपस्थित हुएआमेर के राजा
ठाकुर जी के महान भक्त, जिनकी भक्ति के कारण खुद ठाकुर जी दर्शन देने उपस्थित हुएआमेर के राजा

घाघरा की लड़ाई मे बाबर ने अफगानों को परास्त कर आगरा से उज्बेकिस्तान तक का सम्राट बन गया ।। अगर आजका अनुमान लगाए, तो पूरा पाकिस्तान, अफगानिस्तान , तजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान , भारत का मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश का क्षेत्र आ जाता है, जो वर्तमान भारत से बड़ा विशाल भूखंड बन जाता है, ओर इतनी ही बड़ी जनसँख्या । मुसलमानो में तो हम 4 हमारे 450 बच्चे पैदा करने की परंपरा कोई आजकी तो है नही, यह तो तब से है, जब से इस्लाम है ।। अतः जिस भी राजपूत राजा ने मुगलो से संघर्ष किया है, वह आज के लगभग दुगने बड़े भारत जैसी शक्ति से युद्ध किया है ।।।

जब तक कुछ घटनाओं को वर्तमान के परिपेक्ष में रखकर नही समझा जाता, तब तक सारी घटनाओं का अंदाजा लगा पाना मुश्किल है, जामिया इस्लामिया में अभी कुछ दिनों पहले गोली चली, पुलिस पर आरोप लगा, उसके बाद योगी महाराज जी ने आतंकियों को लठ मार दिए, इन दोनों घटनाओं की मुसलमानो में आलोचना की सो की, हिंदुओ ने भी पूरा सेक्युलरपना दिखाया । और तो ओर एक आध राजपूत नेताओ ने भी मुसलमानो के आतंकवादी कृत्यों पर सहानुभति दिखाते हुए सरकार की ही आलोचना की — अब फिर से इतिहास में लौटिए

जयमल मेड़तिया जी को चितोड़ का किला सौंपकर जब उदयसिंह जी जंगलो में चले गए, तब अकबर विशाल टिड्डिदल लेकर वहां घुस गया । उस युद्ध मे रौजाना 200 राजपूत मरते थे, अंत मे खुद जयमल मेड़तिया जी भी नही बचे ।। जो भारत की प्रजा मुसलमानो के आतंक पर उन्हें लठ मारने तक का विरोध करती है, वह प्रजा क्या चितोड़ के बाद आमेर रियासत में भी वही कत्लेआम होने दे सकती थी ??

भारत भृमण पुस्तक पेज संख्या 223 के अनुसार अकबर के चितोड़ युद्ध मे कुल मृतकों की संख्या का कोई अनुमान नही है, एक मण जनेऊ अकबर ने हिन्दू मृतकों की जोड़ी थी, साफ है, चितोड़ युद्ध मे कई लाख हिंदुओ की निर्मम हत्या हुई थी, कर्नल टॉड ने भी कम कम करते, इस आंकड़े को 35000 लिखा है, हालांकि यह संख्या लाखो मे ही है, लेकिन कर्नल टॉड की भी माने तो क्या 35000 लोगो की एक साथ मौत भी क्या कम मायने रखती है ??

यह बात सभी इतिहासकारो ने आंकड़ों में मानी है, चितोड़ युद्ध के बाद अकबर 8000 राजपूत स्त्रियों और 30,000 अन्य हिन्दू जातियों की स्त्रियों को बंधक बनाकर ले गया ।। जबकि इसकी संख्या और ज़्यादा है ।। लाखो लोगो की मौत, ओर लाखो लोगो का एक साथ बंदी बन जाना,मान सिंह जी ने यहां कूटनीति से काम लिया

आज क्या भारत पाकिस्तान से कम है ? पल भर में भारत पाकिस्तान को राख का ढेर बना सकता है, लेकिन भारत यह भी जानता है कि , उसे खुद भी इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी । अगर तुम्हारे अंदर मरने कटने का इतना ही जोश है तो पाकिस्तान पर हमला कर अरब तक लूटते चलो, जीत लो सारी दुनिया, कौन रोकने वाला है तुम्हे ? लेकिन हम स्थिति को समझते है, हम स्थिति को समझकर अंतरास्ट्रीय कानूनों का पालन करते है, तो इसका मतलब यह नही है, की भारत की सेना, भारत की सरकार या भारत की जनता गद्दार है — हमे अपनी स्थिति पता है , ओर इसी लिए हम अनावश्यक युद्ध से बचते है ।। यही तो मानसिंहः जी ने किया था, जबकि इराक में एक राजा हुए था सद्दाम हुसैन, उसने स्थिति को समझा नही, ओर अमेरिका जैसे शेर के जबड़े में अपना मुंह डाल दिया, भले ही सद्दाम अल्पबुद्धि मुल्लो के लिए आदर्श हो, लेकिन उसके बाद आज इराक के क्या हाल है ? सदाम हुसैन की तरह आत्मघाती कदम उठाना राष्ट्र की हानि करवाना है ? या भारत की तरह सूख शांति से रहना समझदारी है ?? मानसिंहः जी ने ओर क्या किया था ? उन्होंने अपने सम्मान से ज़्यादा राष्ट्र के हित की सोची , क्या यही उनका अपराध था ? वह लाखो हिंदुओ की हत्याएं होते नही देखना चाहते थे, क्या यही उनका अपराध था, स्त्रियों की कहराती तड़पती चीखे वह नही सुनना चाहते थे, क्या यही उनका अपराध था ??

चितोड़ के बाद अकबर ने रणथंबोर पर आक्रमण किया, इस रणथंबोर के किले जो जितने का प्रयास आमेर घराना भी कर रहा था – साफ है, की चितोड़ युद्ध तथा रणथंबोर युद्ध तक आमेर अपनी शक्ति बढ़ाकर अकबर का सामना करने की कोशिश में ही था, लेकिन अकबर के पास विशाल टिड्डी दल था, ओर जिहाद के नाम पर वह मरने को तैयार भी थे, मुसलमान हिंदुओ की तरह तो है नही, जो यह सोचे कि ” भारत मे बार बार भगतसिंह पैदा तो हो, लेकिन पड़ोसी के घर हो ” । वह तो जिहाद के नाम पर मरने मारने को उतारू है, आज यह मात्र 14% होकत भी 80 % हिंदुओ को धमका रहे है, लेकिन तब तो इनके पास पूरा पाकिस्तान, अफगानिस्तान, उज्बेकिस्तान ओर भारत के मुसलमानो का साथ था ।। अकबर ने अपने जिहादियों के साथ मिलकर रणथंबोर को घेर लिया, ओर जितनी हत्याएं चितोड़ में हुई, वहीं की वही रणथंबोर में हुई, यहां भी अकबर ने 1 मन जनेऊ हिंदुओ की हत्या कर तोल दी ।। यहां लगभग 5000 क्षत्राणियो को जोहर करना पड़ा , इन किसी लड़ाई में अकबर को जयपुर आमेर का साथ नही मिला है ।। इतने बड़े नुकसान के बाद अर्जुनसिंह हाड़ा ने रणथंबोर का किला अकबर को दे दिया । जबकि अगर बुद्धि का प्रयोग किया जाता, तो ना यह नुकसान होता, ओर अपनी तैयारी के लिए थोड़ा समय भी मिल जाता ।।

राजस्थान एक छोटा सा प्रदेश , जिसके वर्तमान दो जिलों में कुछ ही समय के अंतराल में लाखों हिंदुओ की हत्या हो गयी हो, लाखो स्त्रियां बंदी बनाकर बलात्कार के लिए ले जाई गयी हो ? वहां मानसिंहः जी का परिवार अपनी जनता की जरा भी फिक्र ना करता ? क्या अपनी जनता की फिक्र कर लेना ही गद्दारी है ?? क्या मानसिंहः जी अर्जुन सिंह जी हाड़ा की तरह नुकसान उठाकर ही आमेर का समर्पण करते, तभी आपको चैन मिलता ?

यहां मेवाड़ में महाराणा प्रताप हुए, जिनके बल और शोर्य से अकबर भी थर्रा गया, उस समय भारमल के पुत्र भगवंतदास जी इर्डर मे थे — अकबर ने आदेश दिया उन्हें की महाराणा प्रताप को जीतो ।। भगवंत दास ने पत्र लिखा ” आप स्वयं भी आये, ओर महाराणा प्रताप की हार का आनंद लीजिये ” । यहां आमेर नरेश की कूटनीति साफ साफ नजर आती है, वह चाहते थे, अकबर को राजस्थान के हल्दीघाटी में घेरकर मार डाला जाए, लेकिन अकबर के जवाब दिया ” जब मुझे पूरा विश्वास हो जाएगा, तब में आऊंगा ” । मतलब साफ है, अकबर को भी अंदेशा लग चुका था कि भगवंतदास अकबर को घेरकर मरवा डालना चाहते थे, इसलिए वह आया नही ।। ( आमेर के राजा – पेज ५१ ) पर इस बात का साफ साफ वर्णन है ।।

ओर भगवंतदास युद्ध मे जाने से मना भी नही कर सकते थे, अगर मना करते तो अकबर अपना टिड्डिदल लेकर आमेर आ जाता । इधर कुँवा ओर उधर खाई वाली स्थिति थी । इसी बात को लेकर मानसिंह जी महाराणाप्रताप जी के पास गए थे ।।

मानसिंहः जी निश्चित तौर पर भगवंतदास जी का यह संदेश लेकर ही गए थे, की अगर आमेर ने मेवाड़ पर आक्रमण नही किया तो, आमेर ओर मेवाड़ दोनो ही नही बचेंगे ।। यहां पर महारणाप्रतापजी ओर मानसिंहः जी की अवश्य संतुलित चर्चा हुई थी, ओर बाहर यह अपवाह उड़ा दी कि, महाराणा प्रताप जी ने मानसिंहः का अपमान कर दिया, इसलिए वह जोरदार युद्ध करेंगे ।।

अगर ऐसा हुआ होता, तो मानसिंहः जी अपनी पूरी शक्ति के साथ जाते ।। अकबर की पूरी सेना लेकर जाते, ओर ग्वालियर जो आगरा के एकदम निकट है, वहां के राजा रामसिंह तंवर जी भी ग्वालियर छोड़कर हल्दीघाटी इसलिए पहुंच पाए, क्यो की कहीं ना कहीं उन्हें भी कछवाहों का गुप्त संदेश मिल चुका था ।।

मानसिंहः जी महाराणा प्रताप जी के दिये अन्न को सिर की पगड़ी पर रखकर निकले थे, वहीं महाराणा प्रताप जी के लिए उनके सम्मान का उच्चतम स्तर था, वरना अपने शत्रु के अन्न को सिर पर कौन धारण करता है ?

हल्दीघाटी के युद्ध की बात अगर हो, तो मानसिंहः जी ने चितोड़ की प्रजा के किसी एक आदमी को भी नही लुटा, यह बात समस्त इतिहासकार भी मानते है, अगर मानसिंहः जी का महाराणा प्रताप जी के विरुद्ध जरा भी द्वेष होता, तो सबसे पहले उनका ओर अकबर की सेना का सीधा हमला चितोड़ की प्रजा पर होता, जैसा कि अकबर ओर उसके पूर्वज हमेशा करते थे ।।

जब अकबर को यह भनक लग गयी, की मानसिंहः जी और भगवंतदास जी ने अकबर के लिए नही, बल्कि अकबर के विरुद्ध हल्दीघाटी का युद्ध किया है, तो वह पुनः स्वयं महाराणा प्रताप से युद्ध करने निकल पड़ा । युद्ध मे आगे भगवंतदास जी और मानसिंहः जी को रखा, जिससे महाराणा प्रताप मरे या मानसिंहः, फायदा अकबर को ही हो ।। इस युद्ध मे महाराणा प्रताप मिले ही नही ।। संभवतः कच्छवाहो के कारण ही उन्हें सूचना मिल चुकी थी, ओर वह समय रहते ही गायब हो लिए ।।

इसके एकवर्ष पश्चात ही अकबर ने उदयपुर पर एक मुसलमान अफसर के हाथों आक्रमण करवाया, ओर मेवाड़ को जमकर लुटा । लेकिन् फिर भी महाराणा हाथ नही आये, अकबर को अब पूरा विश्वास हो गया कि मानसिंहः ओर भगवंतदास ही महाराणा प्रताप की मदद कर रहे है ।।

नाथवतो का इतिहास पुस्तक में एक वर्णन आता है, की अकबर का एक रिश्तेदार बड़ा कट्टर मुसलमान था – मानसिंहः जी ने उसे अकबर के विरुद्ध भड़का दिया ।। वह वर्तमान पाकिस्तान से अपनी सेना लेकर अकबर को घेरने निकला । मानसिंहः जी अब अकबर के साथ हो गए, ओर उस कट्टर मुसलमान को ढेर कर दिया । अगर यह किया होता, तो लाहौर आदि पाकिस्तानी हिन्दू त्राहिमाम त्राहिमाम कर उठते, ओर अगर वह अकबर के विरुद्ध जीत जाता, तो भारत मे हिंदुओ की ख़ून की ऐसी नदिया बहती, की आज भारत नाम की कोई चीज़ अस्तित्व में नही होती ।।

काबुल के कज्जाक मुसलमान, जो अकबर के भी परममित्र थे, लेकिन सत्ता की महत्वाकांशा उनमें कूट कूट कर भरी थी, मानसिंहः जी ने अफगानिस्तान जाकर पहले कज्जाको को अकबर के विरुद्ध युद्ध करने को भड़काया ।। कारण यह था, की यह कज्जक ही अकबर को हथियारो की सप्लाई करते थे । जैसे ही कज्जाको ने अकबर के विरुद्ध अभियान छेड़ा, मानसिंहः जी ने उनका खात्मा करने की ठान ली । अगर यह कज्जाक भारत मे घुस आते, तो भी तो हिंदुओ का खून ही बहाते ।। मानसिह जी ने हजारो कज्जाको का एक साथ संघार किया ।। इसका लाभ यह हुआ कि मानसिंहः जी को अब सिंध तथा अफगानिस्तान दोनो की मनसबदारी मिल गई । सिंध के हिन्दू निहाल हो गए, क्यो की कई 100 वर्षों बाद उनके जीवन् में सुख चैन लौटा था ।।

उज्बेकिस्तान के मुसलमानो के साथ मिलकर अफगानी काबुली लोगो ने भारत पर आक्रमण करने की सोची,उन्हें रोकने का काम अब मानसिंहः का था, मानसिंहः जी ने भी सुन रखा था कि काबुली किसी के काबू में नही आते , इस कारण मानसिंहः जी ने उनके साथ वैसा ही कड़ा व्यवहार किया, जो वे आजतक हिंदुओ के साथ करते आ रहे थे ।। उनके घर के घर जलाए गए , खेती बाड़ी जला दी, बस्तियां बर्बाद कर दी, घर जला दिए, तुड़वा दिए, कमाने के सारे रास्ते बंद कर दिए । काबुली , जो किसी के काबू में नही आते थे, वह मानसिंहः जी से इतने भयभीत हो गए, की उन्हें मान की मर्यादा मालूम हो गयी, हमेशा युद्ध के लिए ततपर काबुली, अब घर के बाहर निकलने में कतराने लगे ।

उज्बेक , काबुल, तुरान, ईरान, ओर एक पठान राजा भारत पर चढ़ाई की योजना बना रहे थे, मानसिंहः जी ने इन पांच रियासतों को एक साथ मसल कर रख दिया ।। इनके झंडे तक छीन लिए, वहीं पांच रंग के झंडों को मिलाकर आज आमेर कच्छवाहो का ध्वज बना है, जो भारतीयों की वीरता तथा शोर्य का अनूठा अनुपम उदाहरण है ।।

अफगानी लोगो ने अकबर की मानसिंहः की सारी सच्चाई बता दी, की यह आपका मित्र नही, शत्रु है, यह मुसलमानो का घोर शत्रु है, यह मस्जिद तोड़ता है, मुसलमानो के घर फूंकता है । अकबर ने मानसिंहः जी को वहां से हटाकर बिहार का सूबेदार बना दिया ।।

इन्ही मानसिंहः जी ने अपने पिता के सम्मान में हरिद्वार में हर की पौड़ी का निर्माण करवाया, जो आजतक है ।। बेकुराठेश्वर का विशाल मंदिर भी इन्होंने बनवाया ।।

मानसिंहः जी की वीरता का पूरा वर्णन लिखना संभव ही नही है, पूरा क्या अधूरा का आधा भी नही लिखा गया है ।

महाराज मानसिंहः जी आमेर महाधर्नुधर दिग्विजयी राजा थे । उनके स्मृतिचिन्ह इस संसार मे चिरकाल तक बने रहेंगे । दान, दासा, नरु, किशना, हरपाल, ईश्वरदास जैसे कवियों को उन्होंने एक एक करोड़ रुपया उस समय दान दिया था ।। उनके काल मे छापा चारण जैसे उनके दास 100-100 हाथियों के स्वामी हो गए थे । मान के गौदान की सम्पूर्ण संख्या 1 लाख थी ।। अपनी 70 साल आयु में 44 साल तो उन्होंने युद्ध मे ही बिताएं ।। कई बार तो उन्होंने एक एक लाख की सेना वाले मुसलमान राजाओ को परास्त किया , जिसमे एक भी जिंदा वापस नही जा सका था । शीलामाता आदि का सम्मान , ओर उद्धार करने में भी उनका नाम अमर है ।। देश के अधिकांश शहर, गांव, कस्वे, तालाब आदि उन्ही के नाम पर है । बंगाल में मानभूमि, वीरभूमि, सिंहभूमि, आमेर में मानसागर, मानसरोवर, मानतालाब, मानकुण्ड, काशी में मानघाट ओर मानमंदिर , मानगांव, काबुल में माननगर, मानपुरा, अन्यत्र मान-देवीमंदिर, मानबाग, मानदरवाजा, मानमहल, मानझरोखा, ओर मानशस्त्र आदि है ।।

इसके अलावा शीलामाता का मंदिर — गोविन्ददेव जी मंदिर, कालामहादेव मंदिर, हर्षनाथभैरव मंदिर, आमेरमहल, जगतशिरोमणि मंदिर तथा वहां के किले, 8 परकोटे, जयगढ़, सांगानेर की नींव , पुष्कर, अजमेर, दिल्ली, आगरा के किलो की मरम्मत, मथुरा, वृंदावन , काशी, पटना ओर हरिद्वार के घाटों का निर्माण भी मानसिंहः जी ने ही करवाया है ।।

पूरा ग्रँथ तो लिख नही सकता , इसलिए इस पोस्ट को तो यही विराम देता हूँ

इसके बाद भी अगर आप मानसिंहः जी मे कमी देखते है, तो निश्चित रूप से आप मुगलो की औलाद ही है

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